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Social and Legal Studies on Crimes Against Children and Related Laws
बच्चों के विरूद्द अपराध एवं संबंन्धित विधियों पर सामाजिक एवं विधिक अध्ययन
Research Ambition: An International Multidisciplinary e-Journal, vol. 7, núm. I, pp. 12-16, 2022
Welfare Universe


Recepción: 15 Abril 2022

Aprobación: 20 Mayo 2022

DOI: https://doi.org/10.53724/ambition/v7n1.0

सारांश: कोई अपराध घटित हो जाता हैं तो वे उन अपराधों की वजह से कुछ रोजमर्रा की जिन्दगी से हार मानकर टूट जाते है और यहॉ तक की कुछ लोग मानसिक विक्षिप्त भी हो जाते हैं। कई बार इन परिवारों के साथ में बच्चें ही अधिकतर शिकार होते है। क्योकि ये अपरिपक्व समझ के होने के कारण बाहरी दुनिया को ठीक से समझ नहीं पाते और परिवार के सदस्यों को ठीक से बता भी नही पाते है। मानव समाज ने जितना विकास मानव सभ्यता को विकसित करने में किया है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नए-नए आयाम को छुआ है। लेकिन फिर भी अपराधों को रोकने में नाकाम रहे है, भले ही सरकारों द्वारा विभिन्‍न प्रकार के कानून बनाकर लागू कर दिया हो फिर भी अपराधों को रोकने में नकाम रहे है। इस शोध पत्र के माध्यम से बच्चों के विरूद्द होने बाले अपराधों के सम्बन्धों में विधियों का अध्ययन कर समाज पर पड़ने वालें प्रभावों का विश्लेषन करना है।

Keywords: बच्चों के विरूद्द अपराध, बच्चों के विरूद्द अपराधों के सम्बन्ध में भारतीय विधिक दृष्टिकोण, अपराधों के कारण, घर में अपराध घर के बहार अपराध, स्कूलों में अपराध

प्रस्तावना

बच्चों के विरूद्द होने वाले अपराधों के विषय में यदि ऑकड़ों पर एक नजर डाले तो अपराधों में वृद्धि के ही ऑकड़े नजर आते है। जब कि अपराधों को राकेने के लिए वर्तमान में संशाधनों को भी राज्य सरकारों द्वारा बढ़ाया गया है। नई तकनीकी उपकरणों का भी उपयोग किया जा रहा है लेकिन बच्चों के विरूद्द होने बाले अपराधों का ऑकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अगर देखा जाए तो जितनी तरक्की मानव समाज ने की है उसी हिसाब से अपराधों के नए-नए रूप भी सामने आये है। जिनमें समाज व बच्चों के प्रति हाने बाले अपराध चाहे वह अलग-अलग तरह से ही क्‍यों ना किये जा रहे हो जैसे धन संपत्ति से संबंधित अपराध या फिर महिलाओं से संबंधित अपराध और सबसे प्रमुख है बच्चों के प्रति अपराध इन अपराधों को रोकने के लिए कोई एक देश ही नहीं लगभग विश्व के सभी देश अनेक उपाय कर रहे हैं फिर भी अपराधों पर पूर्णता लगाम नहीं लगाई जा पा रही है। आज भी अपराधियों द्वारा नए-नए तरीके ढूंढ कर के कानूनों को ताक पर रखकर अपराधों को अंजाम दिया जाता है। जबतक पुलिस प्रशासन सकिय होता पाता है तब तक अपराधियों द्वारा अपराधों को अंजाम देकर कही गुम हो जाते है। कई बार पुलिस प्रशासन द्वारा शक्ति करने पर कुछ अपराधियों का पकड़ भी लिया जाता हैं तो सबुतो के अभाव में न्यायालयों द्वारा बरी भी हो जाते है। अब सबाल ये आता है कि अपराधों पर लगाम कैसे लगाई जाये।

बच्चों के विरुद्र होने अपराधों के सम्बन्ध में परिकल्पना

अधिकतर आपने और हमने सबने सुना है कि बच्चें हमेशा मन के सच्चे होते है। फिर भी कुछ असमाजिक तत्वों के द्वारा बच्चो के बिरूद्द अपराध क्यो किये जाते है। इसका मुख्य कारण क्या है।

बच्चों के विरूद्द होने अपराधों के प्रमुख कारण

बच्चों के बिरूद्द होने बाले अपराधों के कई कारण हो सकते है। बच्चों के विरूद्द हाने बाले अपराधों से सम्बन्धित कई बार शोधकर्ताओं द्वारा पता लगाने की कोशिश की जा चुकी है लेकिन आज तक किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँच पाना असभव जैसा प्रतीत होता है। लेकिन यदि घटित हुए अपराधों का अवलोकन करें तो ये जरूर कह सकते है कि बच्चों के विरूद्द अपराध क्षेत्रों के अनुसार व उनके आस पास के वातावरण के अनुसार, उनकी पारिवारिक स्थिति, शैक्षिणिक स्तर को भी देखने को मिलता है। कई बार बच्चो प्रति अपराध मात्र कुरीतियो की बजह से भी होते है। कुछ कारण निम्पलिखित है-

  1. 1. अधिकतर बच्चों प्रति अपराध कुरीतियों के कारण भी होते है। जिसकी बजह से जन्म लेने से पहले ही भ्रूण हत्या के रूप में भी देखने को मिलता है।
  2. 2. बच्चों में अपरिपक्व समझ भी इसका अपराधों का प्रमुख कारण हो सकती है, क्‍योंकि स्कूलों में अभी भी बच्चों को अपराधों के सम्बन्ध में कोई गतिविध के बारें में नहीं पढ़ाया जाता है। विछले कुछ दशकों में यदि स्कूली शिक्षा का अवलोंकन करें तो पायेगें कि नैतिक शिक्षा नाम का एक विषय पढ़ाया जाता था लेकिन जब से कम्प्युटर एवं तकनीकी का जामाना आ गया है। तब से केवल टेकनोलॉजी पर ही ध्यान दिया जा रहा है। अभी तक कानूनी शिक्षा एवं अन्य प्रकार के अपराधों के कारणों से बच्चों को जागरूक करने का कोई भी शैक्षिणक पाठ्यकम नहीं बनाया गया है।
  3. 3. आज के दौर में अपना घर चालाने एवं जीवन जीने के लिए आवश्यक संसाधनों को जुटाने के लिए माता-पिता दोनों को काम काज करना पड़ता है। जिसके कारण वह अपने बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते है। जिसके कारण भी बच्चे अपराधों का शिकार हो जाते है।
  4. 4. जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नही होती है। वो अपने बच्चों को उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा नहीं दिलवा पाते है। जिस कारण से भी बच्चों को देश दुनिया के बारें में जानकारी नहीं हो पाती है, और ये बच्चे कुछ असामाजिक तत्वों के आसानी से शिकार बन जाते हैं। और अपने प्रति होने वाले अपराधों का प्रतिरोध भी नही कर पाते है।
  5. 5. आज के दौर में परिवारों का एकांकी होते जाना भी इसका प्रमुख कारण है। क्योंकि जब संयुक्त परिवार होते थे तो माता-पिता के अलावा परिवार के दूसरे लोग भी बच्चों का ध्यान रखते थें। जिससे बच्चे संरक्षित रहते थे और परिवारों की संख्या अधिक होने से असामाजिक तत्वों का भी डर रहता था जिससे वे अपराध करने से भी हिचकिचाते थे।
  6. 6. बच्चो का भरण पोषण ठीक से न हो पाने के कारण भी इनका मानसिक स्तर भी कमजोर हो जाता है। जिसके कारण ये बच्चे सही व गलत का निर्णय नही कर पाते और अपराधों का शिकार हो जाते है।
  7. 7. अपराधों का जन्म देने में सबसे बड़ा कारण आस-पड़ोस का वातावरण होता है। जैसे चातावरण में वयक्ति निवास करता है। वैसे ही उसके बिचार बन जाते है। और जैसे व्यक्ति के विचार बनते है। बैसे ही वह कार्य करने लग जाता है।
  8. 8. कुछ अपराधियों द्वारा अश्लील साहित्य के जरिये भी बच्चों को अपराधों में लपेटने की कोशिश करते हैं और कई बार ये अपराधी कामयाब भी हो जाते है। कई बार पुलिस कार्यवाही में पोर्न फिल्में दिखाते हुये कुद अपराधियों को गिरफ्तार किया जाता है।

बच्चों के विरुद्द अपराधों के प्रकार

कई पुस्तकों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि बच्चों के विरूद्द अपराधों को कई प्रकार से अंजाम दिया जाता है, जिनमें से कुछ प्रमुख है-1

  1. 1. बच्चों की हत्या करना
  2. 2. मद्यपान एंव मादक पदार्थों के सेवन की लत
  3. 3. यौन अपराध
  4. 4. कय-बिकय
  5. 5. बाल अपराधी बनाना
  6. 6. बाल मजदूरी एवं बंधुआ मजदूरी
  7. 7. अपहरण एवं व्यपहरण
  8. 8. बाल विवाह
  9. 9. कूरता या मानसिक अपराध
  10. 10. साईबर अपराध

1.बच्चों की हत्या करना

साईबर अपराध बच्चों के प्रति सबसे अधिक प्रभाव डालते है। क्योकि आज के दौर में प्रत्येक बच्चा किसी न किसी माध्यम से साइबर गजेट से जुड़ा हुआ है। जैसे कि ऑनलाइन क्लास और अन्य प्लेटफार्म के माध्यमों से विडियों देखकर बच्चे पढ़ाई करने लगे है। और जब से कोविड का दौर आया तब से अधिकतर बच्चों की ऑनलाइन पहुँच अधिक हो गयी है। कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा इन बच्चों को आसानी से शिकार बना लेते है। जिसका प्रमुख कारण ये भी है कि बच्चे अपरिपक्व समझ के होने के कारण उन अपारधियों के चंगुल में आसानी से फस जाते है।

2. मद्यपान एंव मादक पदार्थों के सेवन की लत

बच्चें होते हैं मन के सच्चे इसलिए उनको जिस तरफ मोड़ देते है। उसी तरफ वो मुड़ जाते है। कई बार कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा अपने दो नम्बर के धन्धों को चलाने के लिए व अवैध नशीले पदाथ्रो की तस्कारी करने के लिए भी इन बच्चों का दुरूपयोग कर लेते है। जिस कारण से ये बच्चे थोड़े बहुत लालच में आ जाते है और अपराधों का शिकार हो जाते है।

3. यौन अपराध

आज के तकनीकी युग में लोग सबसे ज्यादा इन्टरनेट का उपयोग करके बहुत कुछ सीखने की कोशिश करते है। लेकिन कुछ आसामाजिक तत्वों के द्वारा इनका दुरूपयोग करके बच्चों को अश्लील फिल्मों को दिखाकर यौन अपराधों में लिप्त कर देते है। यह एक ऐसा दलदल है जिसमें एक बार कोई बच्चा यदि फेस जाता है तो कभी बहार नही निकल पाता है। क्‍योंकि समाज भी उसको हेय दृष्टि से देखने लगता है। दुसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि उस बच्चें का जीवन ही बर्बाद हो जाता है।

4. कय-बिकय

बच्चों के कय-विकय के लिए भले ही सरकार द्वारा कई कानून बनाकर अपराधों को रोकने का प्रयास किया जाता है। लेकिन इन अपराधों पर पूरी तरह से लगाम लगा पाना अंसम्भव प्रतीत होता है। क्योंकि आज भी कई जगहो पर बच्चों के कय-बिकय घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा है।

5. बाल आपराधी बनाना

वर्तमान समय में बच्चों के सुधार के लिए कानून बनाकर कई प्रकार की सरकार एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा कई प्रकार की हेल्पलाइन चलाई जा रही है। जिससे बच्चों को अच्छे कार्यो की तरफ अग्रसर किया जा सके। लेकिन फिर ऐसे बच्चे जो लाबारिस होते है या फिर कही से आयात किये गये है अपराधियों के द्वारा इनको लोभ लालच देकर आपराधिक गतिविधियों में लिप्त कर लेते है। और बच्चों के द्वारा किये जाने वाले अपराधों पर पुलिस का भी ध्यान कम जाता है। जिससे अपराधी आसानी से बच जाते है।

6. बाल मजदूरी एवं बघुआ मजदूरी

बल मजदूरी एवं बधुआ मजदूरी भारतीय संविधान के द्वारा निषिद्द कर दिया है फिर कई जगह आज भी होटल, ढाबे, फैक्ट्रियों एवं शहरों में चाय की दुकानों में चाय बेचते हुए मिल जाते है। यदि भारतीय संविधान का अवलाकन करे तो अनु. 23 एवं 24 इसी सम्बन्ध में प्रावधान करता है।

7. अपहरण एवं व्यपहरण

अपहरण एवं व्यपहरण दोनों को ही भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार अपराध की श्रेणी में रखा गया है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 381 में विधिपूर्ण संरक्षता में से व्यपहरण से सम्बन्धित प्रावधान किया गया है। जिसमें यदि किसी नर बच्चें की उम्र 16 वर्ष से कम है, और यदि कोई नारी जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है तो और कोई व्यक्ति किसी बच्चे को बहला फुसलाकर ले जाता है। और उस बच्चे के संरक्षक की बिना सम्मति से तो भा-द.वि. की धारा 361 के अनुसार अपराध की श्रेणी में आता है। भा.द.वि. की धारा 362 के में अपहरण को परिभाषित किया गया है। अपहरण एवं व्यपहरण अलग-अलग प्रयोजन के लिए किये जाते है। जिसके प्रावधान भा.द.वि. की धारा 359 से 376ई तक किये गये है।

8. बाल विवाह

बाल विवाह एक भारत की विकराल समस्या हैं हालाँकि केन्द्र सरकार ने 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरसित कर दिया है एवं एक नया अधिनियम 2006 में पारित किया गया जो कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 कहा जाता है। अधिनियम की धारा 12 के अनुसार यदि किसी बालक का विवाह जो प्राप्ततय नहीं है बहला फूसलाकर कर भी दिया जाता है। तो ऐया विवाह शून्य होगा। यदि कोई बाल विवाह का अनुष्ठापन करता है तो 2 वर्ष का कठोर कारावास और जुर्माना जो कि 4 लाख रूप्ये तक का हो सकता है। सरकार द्वारा इस प्रथा को रोकने की दिशा में उचित कदम उठाने की नहल की है। इसके अंतर्गत उन लोगों के खिलाफ कठोर उपाय किये गये हैं जो बाल विवाह को बढ़ावा देते हैं।

9. करता या मानसिक अपराध

बच्चों की अच्छी शिक्षा और विकास के लिए सरकारों द्वारा अथक प्रयास किये जा रहे है। लेकिन फिर भी कही न कही ऐसी लोगों की मानसिकता ऐसी बन चुकी है कि यदि बच्चों को सही रास्ते पर ले जाना है तो उनको गलतियों के लिए शारीरिक प्रताड़ना देने से सुधारा जा सकता है। कई स्कूलों मे भी यही रवैया अपनाया जाता है। लेकिन शिक्षा के अधिकार 2009 के लागू किये जाने के बाद धारा ॥ द्वारा बच्चों को स्कूलों में प्रताड़ित करने के लिए प्रबन्धित किया है।2 आज भी यदि ऐसे माता पिता जो कम शिक्षित है वो आज भी यही मानते है कि बच्चों को सुधारने के लिए उनकी गलतियों पर प्रताड़ित किया जाना चाहिये। लेकिन अब समय व परिस्थियों के साथ-साथ सभी में बदलाव देखने को मिल रहे है।

10. साईबर अपराध

साईबर अपराध बच्चों के प्रति सबसे अधिक प्रभाव डालते है। क्योकि आज के दौर में प्रत्येक बच्चा किसी न किसी माध्यम से साइबर गजेट से जुड़ा हुआ है। जैसे कि ऑनलाइन क्लास और अन्य प्लेटफार्म के माध्यमों से विडियों देखकर बच्चे पढ़ाई करने लगे है। और जब से कोविड का दौर आया तब से अधिकतर बच्चों की ऑनलाइन पहुँच अधिक हो गयी है। कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा इन बच्चों को आसानी से शिकार बना लेते है। जिसका प्रमुख कारण ये भी है कि बच्चे अपरिपक्व समझ के होने के कारण उन अपारधियों के चंगुल में आसानी से फस जाते है।

बच्चों के विरूद्द अपराघों के सम्बन्ध में कानूनी दृष्टिकोण

भारत में बच्चों के विरूद्द होने बाले अपराधों के बारे में कानूनी दृष्टिकोण हमेशा से सकारात्मक रहा है। जिसके लिए विधायिका द्वारा समय-समय पर बच्चों के हितों को संरक्षित करने के लिए कानूनों को पारित किया गया है। और ऐसे कानून जो पुराने हो गये है। जिनको समय के साथ बदल जाना चाहिये उनको बदला गया है एवं जिनमें संशोधन की आवश्यकता है उनमें आवश्यक संशोंधन करने के बाद लागू किया गया है। जिनमें से कुछ प्रमुख हैः

  1. 1. लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012,
  2. 2. बालक श्रम (प्रतिषेध विनियमन) अधिनियम, 1986,
  3. 3. किशोर न्याय अधिनियम, 1986 (संशोधित) 2000,
  4. 4. बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006
  5. 5. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005
  6. 6. शिशु qe sea, पोषण बोतल एवं शिशु खाद्य (उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992
  7. 7. शिशु दुग्ध अनुकल्प, पोषण बोतल एवं शिशु खाद्य (उत्पादन, आपूर्ति एवं वितरण का विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2003

भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण

भारतीय न्याय पालिका ने भी बच्चों के हितो को संरक्षित करने के उददेश्य से अहम भूमिका निभाई है। भारतीय संसद द्वारा अधिनियम बनाकर बच्चों को संरक्षण प्रदान करने की कोशिश की है, लेकिन प्रश्न ये है कि उर्पयुक्त अधिनियमों का कार्यान्यवयन कैसे किया जाये। कानूनों को जमीनी स्तर पर कार्यान्बित करने के लिए एवं बच्चों के विरूद्द होने बाले अपराधों से बच्चों को संरक्षण दिलाने के लिए कुछ वैधानिक संस्थाओं की स्थापना की गई है। यदि इन संस्थाओं द्वारा कानूनो को लागू करने में लापरवाही की जाती है। तो न्यायालयों द्वारा समय-समय पर मनमानी पूर्ण व्यवहार पर रोक लगाकर कानूनों व अन्य योजनाओं को सही प्रकार से लागू करने के लिए दिशानिर्देशों को जाशी कर लागू करवाने के लिए एक पहल की जाती है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण है जो कि निम्नलिखित है-

स्वपन कुमार साहा बनाम साउथ प्वांइट मान्टेसरी हाई स्कूल और अन्य3इस मामले में माननीय न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया कि स्कूल बसों में बच्चों को सुरक्षित यात्रा करने का मूल अधिकार है। और उस बस में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाना उनके अनुच्देद 21 का उल्लंघन है।

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघा 4

इस मामले में माननीय न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया कि जिन बच्चों की उम्र 14 वर्ष से कम है उन्हें किसी भी जोखिम वाले कार्य में नियोजित नहीं किया जाएगा।

एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य5

इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किय कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को किसी कारखाने में एवं अन्य संकट पूर्ण कार्यों में नियोजित नहीं किया जा सकता।

उननीकृष्णन का वार्दा6

इस मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने 8 वर्ष से 14 वर्ष के बालकों के शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार घोषित कर दिया। सभी ओर से शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार घोषित करने की माँग उठायी जाती रही है। इसके फलस्वरूप सरकार ने 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा शिक्षा के अधिकार को एक मूल अधिकार बना दिया।

बच्चों के विरूद्द अपराधों के सम्बन्ध में सामाजिक अध्ययन

बच्चों के विरूद्द अपराधों के सम्बन्ध में सामाजिक अध्ययन करने के लिए इससे सम्बन्धित प्रश्नोंत्तरों के माध्यम से समाज के लोगों से जानने की कोशिश की गयी है कि बच्चों के विरूद्द होने वाल अपराधों के बारे में वे क्या सोचते है। जसके समबन्ध में ऑनलाइन सर्वे गूगल फॉर्म के माध्यम से की गई है जिसके परिणाम निम्नलिखित है-

प्र. 01: आपके परिवार की प्रकृति क्या / कैसी है?

उ. 01: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 15.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनके परिवार की प्रकृति “गरीबी रेखा में” है। तथा 55.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनके परिवार की प्रकृति “मध्यम वर्गीय” है। और 20.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनके परिवार की प्रकृति“उच्च वर्गीय” है। और 10.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनके



चित्र: 01

प्र. 02: आपका निवास स्थान कहाँ है?

उ. 02: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 60.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनका निवास “शहरी क्षेत्र में” है। तथा वही 25.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनका निवास “ग्रामीण क्षेत्र में” है। और वही 15.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि उनका निवास “महानगर क्षेत्र में” है।



चित्र: 02

उ. 03 उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 54.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि “मूल अधिकारों” में “बच्चों को सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है” शामिल है, और जिसका उत्तर “हॉ” में दिया। तथा 15.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि “मूल अधिकारों” में “बच्चों को सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है” शामिल नही है, और जिसका उत्तर “नहीं” में दिया। और 13.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि “मूल अधिकारों” में “बच्चों को सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है या नहीं” और जिसका उत्तर “मुझे नहीं पता” में दिया। और 18.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि “मूल अधिकारों” में “बच्चों को सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार है” भी शामिल है या नहीं, और जिसका उत्तर “बच्चों के कोई अधिकार नही होता है” में दिया।


चित्र: 03

प्र. 04: क्या आप सहमत है कि बच्चों को सुरक्षित जीवन के लिए उनको अधिकार मिलना चाहिये?

उ. 04: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 55.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों को सुरक्षित जीवन के लिए उनको अधिकार मिलना चाहिये, जिसका उत्तर “हॉ” में दिया। तथा 23.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों को सुरक्षित जीवन के लिए उनको अधिकार तो मिलना चाहिये लेकिन उनका उपयोग समझदारी के साथ हो, जिसका उत्तर “नही” में दिया। और 15. 0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों को सुरक्षित जीवन के लिए उनको अधिकार मिलना चाहिये लेकिन अभिभावक की देख रेख में, जिसका उत्तर “अभिभावक की देख रेख में” में दिया। और 7.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया आज के दौर में बच्चे समझदार होते है, इसलिए बच्चों को सुरक्षित जीवन के लिए उनको अधिकार मिलना चाहिये, जिसका उत्तर “बच्चे अपने अधिकारों के प्रति सजग है में दिया।



चित्र: 04

प्र. 05: क्या आप सहमत है कि बच्चों के विरूद्द अपराध आज भी घटित होते

उ. 05: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 45.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के विरूद्द अपराध आज भी घटित होते है, जिसका उत्तर “हॉ” में दिया। तथा 30.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के विरूद्द अपराध आज भी घटित होते है, जिसका उत्तर “नहीं” में दिया। और 15.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के विरूद्द अपराध आज भी घटित होते है, जिसका उत्तर “कभी-कभी” में दिया। और 10.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के विरूद्द अपराध आज भी घटित होते है, जिसका उत्तर “अब-नही होते” में दिया।



चित्र: 05

प्र. 08: क्या आप सहमत है कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में होता है?

उ. 06: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 43.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में होता है, और “हॉ” में उत्तर दिया। तथा 26.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में नहीं होता है, और “नही” में उत्तर दिया। तथा 13.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में जब कभी होता है, और “कभी-कभी” में उत्तर दिया। तथा 18.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में कभी नही होता है, और “कभी-नही” में उत्तर दिया। बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके घरों में



चित्र: 06

प्र. 07: क्या आप सहमत है कि बच्चों के बिरूद्र अपराध उनके स्कूलों में होता है?

उ. 07: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 38.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके स्कूलों में होता है, और “हॉ” में उत्तर दिया। तथा 35.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके स्कूलो में नही होता है, और “नहीं” में उत्तर दिया। तथा 16.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्दर अपराध उनके स्कूलों में जब कभी होता है, और “कभी-कभी” में उत्तर दिया। तथा 11.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध उनके स्कूलों में कभी नही होता है, और “कभी-नही” में उत्तर दिया।



चित्र: 07

प्र. 08: क्या आप सहमत है कि बच्चों के बिरूद्द अपराध सबसे ज्यादा घर से बहार होने पर होते है?

उ. 08: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 60.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध सबसे ज्यादा घर से बहार होने पर होते है, और हॉ” में उत्तर दिया। तथा 18.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध सबसे ज्यादा घर से बहार होने पर नही होते है, और“नही” में उत्तर दिया। तथा 12.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध सबसे ज्यादा घर से बहार होने पर जब कभी होते है, और “कभी-कभी” में उत्तर दिया। तथा 10.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराध सबसे ज्यादा घर से बहार होने पर कभी नहीं होते है, और “कभी-नही” में उत्तर दिया।



चित्र: 08

Y. 09: क्या आप सहमत है कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों में सबसे ज्यादा उनके करीबी लोग होते है?

उ. 09: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 57.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों में सबसे ज्यादा उनके करीबी लोग होते है, और “हॉ” में उत्तर दिया। तथा 33.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि

बच्चों के बिरूद्द अपराधों में सबसे ज्यादा उनके करीबी लोग होते है, और “नही” में उत्तर दिया। और 10.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों में सबसे ज्यादा उनके करीबी लोग होते है, और उत्तर “थोड़े-बहुत” में दिया।



चित्र: 09

प्र. 10: क्या आप सहमत है कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उचित कदम उठाये गये है?

उ. 10: उपर्युक्त प्रश्न के उत्तर में 52.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उचित कदम उठाये गये है, और “हॉ” में उत्तर दिया। तथा 28.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उचित कदम नहीं उठाये गये है, और “नही” में उत्तर दिया। और 13.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उचित कदम उठाये गये है, और “नये कानूनों का निर्माण किया है” का उत्तर दिया। और 7.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं द्वारा कहा गया कि बच्चों के बिरूद्द अपराधों को रोकने के लिए सरकार द्वारा उचित कदम उठाये गये है, और “लगातार प्रयास जारी है” का उत्तर दिया।



चित्र: 10

निष्कर्ष एवं सुझाव

उर्पयुक्त विवेचन और प्रश्नोत्तरों के आधार पर हम कह सकते है कि बच्चों के विरूद्द अपराधों में कोई कारण नहीं है इसके कई कारण है। सबसे बड़ा कारण हैं उनकी समझ का अपरिपक्व होना जिसके कारण बच्चे अपने साथ होने वाले सही व गलत में भेद नहीं कर पाते है। जिसके कारण असानी से अपराधों के शिकार हो जाते है। और कई बार उनके अपनों लोगो के द्वारा ही उनका शोषण किया जाता है अग घरों की स्थिति में देखे तो बच्चों के द्वारा छोटे-मोटे कार्यो का किया जाना भी एक तरह का मानसिक व शारीरिक शोषण कह सकते है। इसका सबसे बड़ा कारण असम्यक असर के कारण भी ऐसा देखने को मिलता है। अब यदि स्कूलों की बात करे तो स्कूलों में भी भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में प्रतिर्स्पधा को पूरा करने में बच्चों को आवश्यकता से अधिक काम दिया जाना और काम का पूरा न हाने की स्थिति में बच्चों की पिटाई करना व उनको डाटना आय दिन का काम हो गया है। लेकिन जब से शिक्षा का अधिकार कानून का निर्माण किया गया है जिसमे धारा 17 के अनुसार बच्चों की पिटाई को स्कूलों में प्रतिबन्धित किया गया है, तब से सकूलों में कुछ सुधार देखने को मिलता है। लेकिन लगातार मॉनिटरिंग न होने की बजह से स्कूल अपने पुराने ढर्रे पर आ गये है। यदि घर से बहार की स्थिति का अवलोकन करे तो सभी जानते है कि कुछ असमाजिक तत्वों के द्वारा इनकों मॉनिटर करने के बाद जैसे ही मौका मिलता है तो आसानी से शिकार बना लेते है। और ये बच्चे अपने

माता- पिता के डर से कुछ कह भी नही पाते है।

उर्पयुक्त विवेचन के आधार पर सुझाव निम्नलिखित है-

  1. 1. सरकार को चाहिये की ऐसे नियम बनाये कि निश्चित अवधि के अन्तरालों में स्कूलों का निरीक्षण किया जाये एवं प्रत्येक स्कूल के बच्चों से इस सम्बन्ध में बातचीत करके पता किया जाये कि किसी भी प्रकार का शोषण या आपाधिक गतिविधियाँ तो नही चल रही है।
  2. 2. स्कूलों के अन्दर जो शरारती ततव है उनकी काउसिंलिग करके सुधारने की कोशिश करनी चाहिये।
  3. 3. सरकार को चाहिये कि ऐसे निकायों का गठन किया जाना चाहिये जो कि बच्चे के जन्म लेने लेकर उसके वयस्क होने तक निगरानी करे चाहे वो बच्चा कही पर भी रहे।
  4. 4. सरकार व ट्रेफिक पुलिस द्वारा लगभग सभी चौराहों पर सी.सी.टी.व्ही. कैमरे लगाये गये है। उन कैमरों को उपयोग करके बच्चों व अन्य लोगों के साथ होने वाले अपराधों को रोका जा सकता है।
  5. 5. नकारी सरकार के पास पहले से ही आधार कार्ड के माध्यम से उपलब्ध है। जिसका उपयोग करके अपराध करने वालों के ठिकानों का पता लगा कर तत्काल गिरफ्तार किया जा सकता है।

पाद लेख

1 किशोर अपराध: अवलोकन दिनॉक 25 सित्तम्बर 2001: https: //hiwikipedia.org/wiki/ किशोर-अपराध
2 धारा 17: शिक्षा के अधिकार 20091
3 ATR 2009 Rajsthan 63
4 AIR 1983 SC1473.
5 (1996)6 SCC 756.
6 (1993)4 SCC 645.


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